Shayari

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  “माँ”
     रविश मेरी मुझे मेरे काम से जाने नहीं देती।
 मैं जब भी घर से निकलता हूँ माँ मुझे जाने नहीं देती।
   न जाने किस हद तक मैंने अपनी माँ को चाहा है,
   हर्फ़ बोलते नहीं पर आँखें कुछ छुपाने नहीं देतीं।
 
    मैं जब भी सोज में खाने निवाला बैठ जाता हूँ,
  घर की रोटियां मुझे मेरा बचपन भुलाने नहीं देतीं।
   मैं जब भी साथ होकर भाइयों,बहनों से लड़ता हूँ,
    बड़े ही प्यार से कहकर माँ उन्हें सतानें नहीं देती।
     कुर्बतें माँ के दिल से मेरे दिल की जाने कब से हैं,
   मैं जब भी सोचता हूँ कह दूँ, माँ मुझे बताने नहीं देती।

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